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Saturday, 13 July 2013

सफर

न बदले तुम न बदले हम
न भूले तुम न भूले हम
मिले हैं बाद मुद्दत के
हैं बिलकुल सामने फिर भी
अजब सी बात है अब तक
न बोले तुम न बोले हम.
हाथ में ले कोई पुस्तक
तुम्हारे सामने हूँ मैं
और तुम आँख मूँदे हो
यह जो उपकरण अपनी जब में रख रखा है तुमने
और जो तार इससे तुमने कानों में लगाए हैं
तुम शायद इनसे ही भेजी हुई
सुमधुर संगीत की तानों में खोये हो.
है मुझको याद वो दिन
जब हमारी जेब में पैसे कम
मगर दिल में ज़ज्बात भरपूर होते थे
घूमते तब भी थे हम साथ में
और तब
न दिल में और न गाड़ी को खिड़कियों में ही
दूर कर दें जो एहसासों को ऐसे काँच होते थे.

न केवल तुम न केवल मैं
मगर पूरा का पूरा कूपा ही
जरा सा वक़्त बीते और एक परिवार लगता था
बड़ा विश्वास था सब पर
और तब आदमी को आदमी भी तो
ज़रा सी चूक हो जाने पे
ऐसे तो ना ठगता था.
मानता हूँ
बहुत आराम तन को मिलता है इसमें
की जब
बाहर की तपती धूप, गर्मी और पसीने से
बचाता है ये वातानुकूलित रेल का डिब्बा
मगर भाई मेरे
ना जाने क्यों
मुझे यह लग रहा है कि
ये अपने रिश्तों में भी जैसे
ठंडक घोल देता है
वरना उस धूल, गर्मी और पसीने वाले डिब्बे में
तो अब तक
अजनबी भी अजनबी से बोल देता है.
“कहाँ जायेंगे भाई सा’ब?”
“अरे हम भी उधर के हैं!!!!!”
ये
और ऐसी बातों से
बातें आगे बढ़ निकलती हैं
और यहाँ
सब खुद में इतने गुम हैं कि
सारा डिब्बा है भरा फिर भी
जैसे कोई ना हो इसमें
ऐसी चुप्पी छाई है
कभी सॉरी, कभी एक्स्कूज मी
को छोड़ कर अब अब तक
किन्ही बातों कि कोई आवाज़
कहीं से भी ना आई है.

बढ़ाकर हाथ खिड़की से
कप वो चाय का लेना
खुली खिड़की
खुले दिल
और खुले मन से
बहारों का
नजारों का
हवाओं का मज़ा लेना.
किसी बुज़ुर्ग या महिला को खड़ा देखकर
मानवी एहसास से
“एडजस्ट” हो जाना
और यहाँ
सम्भ्रांत नागरिकों के इस डिब्बे में
बड़ा मुश्किल है
संवेदनाओं का ठहर पाना.
ना जाने क्यों
मुझे ये लग रहा है कि
प्रकृति के कुछ
कष्टप्रद पहलुओं से
बचने के लिए
हमने
जुटाई हैं जो तकनीकें
हम उन्हीं के गुलाम हुए जा रहे हैं
और उन कुछ पहलुओं से बचने कि कोशिश में
हम
प्रकृति से ही दूर हुए जा रहे हैं.
नहीं भाता विचारों का कैद हो जाना
नहीं भाता इरादों का भलाई से इतर जाना
नहीं भातीं हैं इतनी औपचारिकताएं अपनों से
नहीं भाता “वसुधैव कुटुम्बकम्” का सिमट जाना.
  
मेरे भाई
उठो
अब मन कि खिड़कियाँ खोलें
यांत्रिक तन्द्रा से जागें
आपस में कुछ बोलें
रहें ना शान्त अपने में
नेह रिश्तों में कुछ घोलें.
तोड़ दें दायरे छोटे
मुस्कराएं, हंसें, खिलखिलाएं
कुछ सुनें
कुछ अपनी सुनाएं
ऐसे जियें
कि ध्येय तक
पहुँचाने वाला ये सफर
यादगार हो जाए
हर पल एक याद छोड़ जाए

सफर में अर्थ जुड़ जाए.