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Saturday, 13 July 2013

तुम्ही बता दो

तुम्ही बता दो कि तुममें है क्या
जो हम दीवाने से हो रहे हैं
तुम्हारे चेहरे, तुम्हारी ज़ुल्फों
तुम्हारी आँखों में खो रहे हैं.
तुम्ही बता दो कि तुममे है क्या
जो हम दीवाने से हो रहे हैं

नहीं है दिन में कोई सुकूँ अब
न रात में नींद है ज़रा सी
खुली सी पलकों में बस तुम्हारे
हसीन सपने सँजो रहे हैं.
तुम्ही बता दो कि तुममें है क्या
जो हम दीवाने से हो रहे हैं

ये बारिशों की हसीन रिमझिम
औ आसमां पे ये सप्तरंगी
तुम्हारे आने की आरज़ू में
गुलों की चादर पिरो रहे हैं.
तुम्ही बता दो कि तुममें है क्या
जो हम दीवाने से हो रहे हैं

हमीं नहीं क़ायनात सारी
तुम्हारे दम से महक रही है
तुम्हारी साँसों की खुशबुओं से
ही सारे मदहोश हो रहे हैं...
तुम्ही बता दो कि तुममें है क्या

जो हम दीवाने से हो रहे हैं

क्या लिखूँ........

क्या लिखूँ......
यूँ समझ लीजिये की बस एक कतरा हूँ
 दरिया बनना चाहता हूँ 
खोया ज़रूर हूँ 
पर बहका नहीं हूँ...
राह न सही, मंजिल का पता ज़रूर है....
रास्ता अगर मंजिल से पहले बन जाए,
तो अक्सर यूँ ही ख़तम हो जाता है...
इसलिए
रास्ता तो बन ही जायेगा
जब मंजिल मालूम है...
आपका साथ चाहता हूँ..
हौसला चाहता हूँ...
दुआएँ चाहता हूँ...
आपके दिल तक खुद को...
पहुँचाना चाहता हूँ....
अपनी दूरियाँ मिटाना चाहता हूँ...
कुछ आपसे सुनना चाहता हूँ....
कुछ आपको सुनाना चाहता हूँ...
मैं तो जाने कब से आपका हूँ...
अब आपको अपना बनाना चाहता हूँ...
"पथिक" हूँ 
आपके दिल में ठिकाना चाहता हूँ.....