Saturday, 13 July 2013

दो कदम...

हवाओं में मोहब्बत की चलो खुशबू बिखेरें अब
कि नफ़रत के ज़हर में अब जिया जाता नहीं पल भर
ज़रूरी है पहल करके बढ़ाएँ दो कदम हम तुम
कहीं बच्चों का भोलापन न ले ले खौफ़ का मंज़र.....

क्या लिखूँ........

क्या लिखूँ......
यूँ समझ लीजिये की बस एक कतरा हूँ
 दरिया बनना चाहता हूँ 
खोया ज़रूर हूँ 
पर बहका नहीं हूँ...
राह न सही, मंजिल का पता ज़रूर है....
रास्ता अगर मंजिल से पहले बन जाए,
तो अक्सर यूँ ही ख़तम हो जाता है...
इसलिए
रास्ता तो बन ही जायेगा
जब मंजिल मालूम है...
आपका साथ चाहता हूँ..
हौसला चाहता हूँ...
दुआएँ चाहता हूँ...
आपके दिल तक खुद को...
पहुँचाना चाहता हूँ....
अपनी दूरियाँ मिटाना चाहता हूँ...
कुछ आपसे सुनना चाहता हूँ....
कुछ आपको सुनाना चाहता हूँ...
मैं तो जाने कब से आपका हूँ...
अब आपको अपना बनाना चाहता हूँ...
"पथिक" हूँ 
आपके दिल में ठिकाना चाहता हूँ.....