Saturday, 13 July 2013

अभिलाषा

कल
मेरा तीन साल का बेटा
मेरे पास आया
और अपनी तोतली बोली में
थोड़ा तुनक कर मुझसे बोला
“पापा
मुझे जल्दी से बड़ा होना है.”
मैंने पूछा
“क्यों बेटा क्या हुआ”
तो उसने बताया
मम्मा टी.वी. नहीं देखने देती
कहती है
टी.वी. देखने से आँखें खराब हो जाती हैं
आप भी
अपने लैपटॉप पर काम नहीं करने देते
“काऊ” मुझे मारती है
कोई मुझे पानी में खेलने नहीं देता
कोल्ड्रिंक नहीं पीने देता
हर काम पर रोकते हैं
कहते हैं
बड़े होना फिर करना
मैं जल्दी से बड़ा हो जाऊँगा
फिर सब करूँगा
कोई नहीं रोकेगा.”
बेटा चुप हो गया
मैं सोचने लगा
कभी मैं भी छोटा था
इतना ही
जब सब मुझे भी टोकते थे
मुझे भी खूब बुरा लगता था
काश
कि वक्त लौट आता
मैं फिर से छोटा बन जाता
कोई फिर से मुझे भी रोकता
काश
मुझे फिर से
पापा के घर आने के समय
टी.वी. देखने से डर लगता
काश
पापा फिर से पढ़ाते
डाँटते
मारते.
काश
मम्मी फिर से
स्कूल के लिए सुबह उठाती
टिफिन तैयार करती
काश
फिर स्कूल में
होमवर्क न करने पर सजा मिलती
काश
फिर इम्तिहान होते
और हम एक-एक नम्बर के लिए
मैम से गिडगिडाते
काश
फिर से
हमें धूप में न खेलने की हिदायतें मिलती.
काश
मैं फिर
नए कपड़े के लिए जिद कर पाता
और कुछ पाने पर
उतना ही खुश हों पाता
काश
होली पर
रात में फिर दादी गुझिया बनाती
और मैं
गरम गरम खाने की लालच में
जाग कर बनवाता
काश
दीपावली पर पटाखे चलाता
और सावन में झूले झूलता.....
काश.....
मैंने बेटे को देखा
उसके बचपन को निहारा
मैंने कहा
“हाँ बेटे
आप बहुत बड़े बनोगे
सब करोगे
मगर
इतनी जल्दी मत बड़े हो
बचपन को जी लो
इसका आनंद कभी नहीं मिलेगा
और फिर
मैं भी तो
आपमें अपना बचपन जी रहा हूँ
आपके साथ खेलता हूँ
सब भूल कर
लगता है फिर बच्चा हूँ.
मेरा बचपन हो आप.
बड़े होना
खूब बड़े होना
मगर धीरे-धीरे.
मैं बोलता गया
जाने कब तक
मगर शायद
मेरी बातें
उसकी समझ में
नहीं आयीं थीं
क्योंकि
जब मैं अपनी तन्द्रा से जगा
वो अपनी माँ के साथ

अक्कड-बक्कड़ खेल रहा था.

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